सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2

भारत में नियोजित विकास के संदर्भ में केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों के बदलते पैटर्न का परीक्षण कीजिए। हाल के सुधारों ने भारत में वित्तीय संघवाद को कहाँ तक प्रभावित किया है? (15 अंक, 250 शब्द)

संघ और राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढांचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसमें चुनौतियाँ

परिचय

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध भारत के राजकोषीय संघवाद की रीढ़ हैं। संविधान अनुच्छेद 268-293 और सातवीं अनुसूची के तहत वित्तीय शक्तियों के वितरण का एक ढांचा प्रदान करता है। स्वतंत्रता के बाद नियोजित विकास को अपनाने और हाल के आर्थिक सुधारों के साथ, संघ और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों के पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव आया है।

मुख्य भाग

नियोजित विकास के संदर्भ में विकास

  • योजना आयोग युग (1950-2014): संसाधन आवंटन काफी हद तक केंद्रीकृत था। राज्य योजना अनुदानों और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए पूरी तरह से संघ पर निर्भर थे।

  • वित्त आयोग की भूमिका: अनुच्छेद 280 के तहत स्थापित, यह संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संतुलन बनाए रखने के लिए कर हस्तांतरण और सहायता अनुदान की सिफारिश करता है।

  • लंबवत और क्षैतिज असंतुलन: राज्यों के पास उच्च व्यय की जिम्मेदारियां थीं लेकिन सीमित कराधान शक्तियां थीं, जिससे केंद्र से धन हस्तांतरण आवश्यक हो गया था।

राजकोषीय संघवाद पर हाल के सुधारों का प्रभाव

  • योजना आयोग को नीति आयोग द्वारा प्रतिस्थापित करना (2015): इसने ध्यान केंद्रीकृत योजना से हटाकर सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद पर केंद्रित किया।

  • 14वें और 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें: करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 41% कर दी गई, जिससे राजकोषीय स्वायत्तता बढ़ी।

  • वस्तु एवं सेवा कर (GST) – 101वां संविधान संशोधन: इसने एक एकीकृत कर प्रणाली और जीएसटी परिषद का गठन किया, जिससे सहकारी राजकोषीय निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत हुई।

  • परिणाम-आधारित हस्तांतरण: प्रदर्शन-आधारित अनुदान और पारदर्शिता पर अधिक जोर दिया गया।

निष्कर्ष

हाल के सुधारों ने कर हस्तांतरण, संस्थागत सहयोग और राज्यों के लिए नीतिगत लचीलेपन को बढ़ाकर राजकोषीय संघवाद को मजबूत किया है। हालांकि, जीएसटी मुआवजे, सशर्त हस्तांतरण और राजकोषीय बाधाओं से जुड़ी चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं, जिनके लिए संतुलित विकास हेतु संघ और राज्यों के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता है।

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